Read this article in Hindi to learn about the process of collective bargaining.

1. विचार-विमर्श चरण (Negotiation Stage):

सामूहिक सौदेबाजी की प्रक्रिया/प्रणाली जटिल होते हुए भी दिलचस्प होती है । इसके कई रूप/स्तर हो सकते हैं । कुछ आधारभूत बातें सामूहिक सोदेबाजी की सभी प्रक्रियाओं में पाई जाती हैं ।

सामूहिक सौदेबाजी के विभिन्न पहलू चरण निम्नलिखित हैं:

(1) वार्ता से पूर्व का चरण (Pre-Negotiation Phase):

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सामूहिक सौदेबाजी प्रबन्ध की भांति एक कला है, विज्ञान नहीं । सामूहिक सौदेबाजी को एक अभिनय बताया गया है, जिसमें दोनों पक्षकार एक-दूसरे की शक्ति का परीक्षण करते हैं, छल-कपट करते हैं, और आदान-प्रदान के माध्यम से समझौते में सम्मिलित हो जाते हैं ।

वार्ता से पूर्व का पहलू कुछ आवश्यक बातों की ओर संकेत करता है । उदाहरण के लिए प्रबन्ध को चाहिए कि वह कर्मचारी संघों या संघ के बारे में पूर्ग जानकारी प्राप्त कर ले कि संघ या संघों की शक्ति कितनी है, इसके पीछे समर्थन तथा सहयोग कितना है, और यदि समझौता न हो सके तो क्या यह संघ हडताल आदि की कार्यवाही करवाने में सफल हो सकेगा अथवा नहीं ।

इस प्रकार कर्मचारी संघ या संघों को भी चाहिए कि वे प्रबन्ध के सम्बन्ध में समस्त आवश्यक जानकारी तथा उन बातों अर्थात् मदों पर, जिनको कि तय किया जाना है, के सम्बन्ध में समस्त आवश्यक आंकड़े, तथ्य एवं प्रमाण एकत्रित कर लें, जिससे कि उनकी सहायता से अपने पक्ष को मजबूत किया जा सके ।

प्रबन्ध एवं कर्मचारी संघ को चाहिए कि वे दोनों ही उन समझौतों या ठहरावों की प्रतियाँ भी प्राप्त कर लें जो कि अन्य संगठनों या संघों के साथ किये थे संक्षेप में वार्ता से पूर्व की स्थिति तैयार की स्थिति है । वार्ता के लिए पूर्ण तैयारी ही इस पहलू की विषय सामग्री है ।

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(2) वार्ता का चयन (Selection of Negotiators):

वार्ताकारों का चयन सामूहिक सौदेबाजी की सफलता के लिए बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए । वार्तकारों का चयन सेवानियोजकों या प्रबन्धकों की ओर से तथा कर्मचारी संघों की ओर से किया जाता है ।

वार्ताकारों का चयन करते समय इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वार्ताकार कार्य की दशाओं से, श्रम प्रबन्ध सम्बन्धों से एवं अन्य आवश्यक बातों से पूर्णतया परिचित हैं, और इस योग्य हों कि वे वार्ता को सफल बनाकर किसी समझौते पर सहमत हो सकेंगे ।

प्रबन्ध की ओर से ऐसे वार्ताकारों में विभागीय अध्यक्ष, मानव संसाधन प्रबन्धक, कोई संचालक, मुख्य या उप-अधिशासी या कोई कानूनी सलाहकार हो सकता है । इसके अतिरिक्त सामूहिक सौदेबाजी की प्रक्रिया में यदि वार्ता के क्षेत्र को अधिक विस्तृत बनाना हो तो समितियों का प्रयोग भी किया जा सकता है ।

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इन समितियों में उपयुक्त व्यक्तियों के अतिरिक्त विभागीय फोरमैन भी सम्मिलित हो सकते हैं । कानूनी सलाहकार की सेवाओं का उपयोग करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि वह कोई मुख्य वार्ताकार न हो । प्रबन्ध को चाहिए कि केवल उनकी योग्यता एवं कौशल का ही लाभ उठाये ।

इसी तरह कर्मचारी सघों की ओर से भी वार्ताकारों का चयन सावधानी से किया जाना चाहिए । एकल सामूहिक सौदेबाजी की स्थिति में स्थानीय कर्मचारी संघ का सचिव, अध्यक्ष या व्यावसायिक प्रतिनिधि हो सकते हैं ।

यदि सामूहिक सौदेबाजी राष्ट्रीय स्तर की है, तो राष्ट्रीय स्तर के श्रम नेता राष्ट्रीय कर्मचारी संघों के सचिव या अध्यक्ष और अन्य अनेक प्रभावी व्यक्ति चुने जाने चाहिए, जिन्होंने पूर्व में भी ऐसे समझौते कराये हों और जिनका प्रभाव श्रमिकों तथा प्रबन्धकों के मध्य अच्छा हो ।

(3) सौदेबाजी का चक्रव्यूह (Strategy of Bargaining):

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सामूहिक सौदेबाजी के लिए की जाने वाली वार्ता का सत्र प्रबन्ध एवं कर्मचारियों दोनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है । श्रम लागत दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । श्रम-प्रबन्ध समस्याओं के निपटारे के लिए प्रभावी उपायों की तीव्रता को अनुभव किया जा रहा है ।

सामूहिक सौदेबाजी एक ऐसी व्यवस्था है, जो आदानप्रदान अर्थात ‘ले और दे’ (Give and Take) के सिद्धान्त पर आश्रित है, जो कर्मचारियों को भी प्रबन्धकीय दायित्वों में हिस्सा बाँटने के लिए प्रोत्साहित करती है ।

इसलिए प्रबन्ध एवं कर्मचारी संघ को चाहिए कि वे पहले से ही ऐसी नीतियाँ अवश्य निर्धारित कर लें जिनके अनुसार पारस्परिक उत्तरदायित्वों एवं अधिकारों का निर्धारण किया जाना है ।

प्रबन्ध को चाहिए कि सभा कक्ष में प्रवेश करने से पहले मूलभूत योजनाये एवं नीतियाँ निर्धारित कर ले तथा आवश्यक अधिकार प्राप्त कर ले जिससे कि समझौता करने में कोई कठिनाई न आये और संगठन द्वारा उसे आसानी से लागू किया जा सके ।

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उदाहरण के लिए प्रबन्ध को यह तय करना चाहिए कि वे अधिकतम कितनी छूट या सुविधाओं दे सकते हैं, वे कौन-सी मदों पर किस प्रकार सहमत हो सकते हैं, आदि का पूर्व में ही निर्धारण कर लिया जाना चाहिए । हड़ताल आदि की धमकी की व्यवस्था में कौ-नसा रुख अपनाया जाना चाहिए ।

हड़ताल कर्मचारी संघों की सामूहिक सौदेबाजी की प्रणाली का मुख्य हथियार है । इसलिए कब कर्मचारी संघ इसका प्रयोग कर सकते हैं, अर्थात् कौ-नसे मामले में हड़ताल आदि की धमकी अहित कर सकती है, इसकी पहचान भी प्रबन्धकों को आनी चाहिए ।

हड़ताल की धमकी की स्थिति आदि की दशा में जनता को सूचना देने की भी व्यवस्था होनी चाहिए, जिससे कम्पनी के विरुद्ध एक जनमत का निर्माण न हो सके ।

(4) सौदेबाजी की युक्तियाँ (Tactics of Bargaining):

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सौदेबाजी की नीतियों का निर्धारण वार्ता-कक्ष में प्रवेश करने से पूर्व ही कर लिया जाता है, किन्तु सौदेबाजी की युक्तियों का प्रयोग नीतियों के अनुसार वार्ता मेज पर किया जाता है । वास्तव में युक्तियाँ विशेष प्रकार की कार्यवाहियाँ होती हैं, जो कि वार्ता करते समय प्रयोग की जाती हैं ।

यद्यपि बहुत से विद्वानों का मत है, कि सामूहिक सौदेबाजी में कर्म-विषयकता (Objectivity) होनी चाहिए, किन्तु व्यवहार में दोनों पक्ष युकिायों का सहारा लेकर सामने वाले पक्ष को कम देकर अधिक लेना चाहते हैं । सामने वाले पक्षकार को भ्रमित करने हेतु सौदेबाजी की युकिायाँ अपनाई जाती हैं । प्रबन्ध यह प्रयत्न करता है, कि सम्पूर्ण अनुबन्ध को सामने रखकर वार्ता की जाये ।

किन्तु कर्मचारी संघ सम्पूर्ण अनुबन्ध पर एक साथ नहीं अपितु अनुबन्ध के प्रत्येक वाक्य पर अलग-अलग रूप से वार्ता करने के इच्छुक होते हैं । अलग-अलग मद पर बातचीत हो जाने के पश्चात् अर्थात् विश्लेषण के पश्चात् लिये गये निर्णयों का पुनर्मूल्यांकन तथा पुनर्निरीक्षण किया जाता है ।

ऐसा करने के बाद ही अगली मद पर विचार किया जाता है । प्रबन्धक चाहते हैं कि वार्ता सत्र जितना अधिक लम्बा हो उतना ही अच्छा है, किन्तु कर्मचारी संघ सम्पूर्ण सत्र या अत्यधिक विस्तृत सत्रों को प्राथमिकता नहीं देते हैं । कुछ आलोचकों का कथन है, कि सौदेबाजी करते समय ‘अश्व व्यापार’ (Horse Trading) एवं मोल-तोल की तकनीकों को काम में नहीं लिया जाना चाहिए ।

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इनके स्थान पर तथ्यों के प्रस्तुतीकरण एवं समस्या के समाधान का दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, क्योंकि ये उचित एवं उपयुक्त प्रतीत होते हैं, जबकि मोल-तोल, आदि अवैधानिक युक्तियां हैं । इसके अतिरिक्त यदि किसी पक्षकार द्वारा रखी गई माँग अन्य पक्षकार को अप्रिय या अरुचिकर लगती है, तो ऐसी अवस्था में तत्काल ही उस माँग का विरोध नहीं करना चाहिए ।

कुछ समय तक शान्ति से पूरी बात सुनी जानी चाहिए । इसके विपरीत यदि प्रबन्ध संघ की बात को चुपचाप सुनकर भी कुछ नहीं कहता है, तो ऐसे मामलों में प्रबन्ध की सहमति प्रकट होती है, और कर्मचारी संघ दूसरे दिन या अन्य समय जो माँगे रखेंगे वह निश्चय ही एक अनियन्त्रणीय समस्याओं को जन्म देगी सरकारी मध्यस्थों आदि की सेवाओं को भी उपयोग में लिया जाना चाहिए ।

उनको सूचना दी जानी चाहिए और सामूहिक सौदेबाजी की वार्ता को सफल बनाया जाना चाहिए ।

Arnold Campo सुझाव देते हैं, कि Negotiation में निम्न प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए:

यूनियन प्रबन्ध के लिए (For Union Management):

(1) वार्ता में पूर्णत: चित्रवत् बने रहें । प्रत्येक का परिचय करायें विद्यमान तनाव को समाप्त करें ।

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(2) सुनने के इनखुक बनें । आपके पास पर्याप्त समय होगा कि आप उन बातो की चिन्ता कर सकें तथा सभी तथ्यों को सुन चुकने के बाद कहें, “No” ।

(3) प्रत्येक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने तथा अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का अवसर दें । इस तरीके से आप उस व्यक्ति के विचार जान पायेंगे जो वास्तव में किसी समस्या या शिकायत विशेष पर अडिग है, तथा समझ सकेगे कि उससे कैसे निपटा जाये ।

(4) अन्य पक्षकार के प्रतिनिधि के व्यक्तिगत इतिहास के बारे में कुछ जानें ।

(5) यह बात सदैव ध्यान रखें कि आपको वह करना है, जो सही तथा उचित है ।

(6) दोनों पक्षकारों को समस्या तथा शिकायत के प्रति एक वस्तुनिष्ठ व्यवस्था को बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए । उनको एक समस्या के माध्यम से अपनी भावनाओं को महसूस करने की अपेक्षा खुलकर सोचना चाहिए ।

(7) एक सीधी रेखा पर विचार-विमर्श को गाइड करने का प्रयास न करें जो समस्याओं के समाधान के प्रति एकदम सीधी जाती हो । इसको इधर-उधर जाने दो, ज्यादा जल्दी मत दिखाओ ।

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(8) Negotiation के कदापि अवरोध (Statement) के चरण तक न जानेदो । समस्या को परिभाषित करने में मदद करें तथा एक समाधान सुझायें । Negotiation को परे ही रहने दें ।

(9) यदि तथ्य यह व्यक्त करें कि निकट समस्या को सुलझाने मात्र की अपेक्षा कुछ अधिक करने की आवश्यकता है, तो परिस्थितियों में कितना उचित हो वहाँ तक जायें ।

(10) प्रत्येक मुद्दे को स्पष्टत: तथा ईमानदारी से समझायें तथा सभी उपलब्ध तथ्यों की पृष्ठभूमि में वर्णन करें ।

(11) अनुबन्ध में विशिष्ट नियम-विधानों तथा विवरणों के समावेश से बचें ताकि और अधिक सुनिश्चित हो सकें ।

(12) सदैव सही समाधान के लिए खोज करें ।

(13) गोष्ठी की सदस्यता को जितना सम्भव हो सके छोटा रखें । छोटे समूह सफल समझौता वार्ता को सुचारु बनाते हैं ।

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(14) Sharp Practices से बचे ।

(15) एक सत्र की लम्बाई उस थकान, शारीरिक या मानसिक, द्वारा तय की जानी चाहिए जो यह गोष्ठी टेबल पर सदस्पों के बीच उत्पन्न करता है ।

(16) विचार-विमर्श के दौरान एक Committee of Employees को रहने दें, क्योंकि यह अत्यधिक लाभप्रद तथा व्यावहारिक रहेगी, विशेषत: यदि सौदेबाजी यूनिट एक एकाकी संस्थान होता है ।

(17) वे शर्तें जिन पर सहमति होती है, उनको लिखित में लाया जाना चाहिए तथा पक्षकारों को बिना किसी दिमागी आपत्तियों के प्रपत्र पर हस्ताक्षर करने चाहिए । अनुबन्ध की शब्द रचना सटीक तथा वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए, कानूनी सी नहीं ।

(18) पंच निर्णय का सहारा नहीं लिया जाना चाहिए ऐसे मामलों को छोड्‌कर जिनमें समझौता वार्ता बुरी तरह असफल हो जाये या पक्षकार किसी समझौते तक पहुँचने में असमर्थ हो जायें ।

(19) दोनों ही पक्षकारों को जनता के अधिकारों का सदा सम्मान करना चाहिए ।

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प्रबन्ध के लिए (For the Management):

(a) शुरू से ही प्रबन्ध को यह निश्चित कर लेना चाहिए कि श्रमिक नेता समझौता वार्ता करने जा रहे है, तो वास्तव में श्रमिको के प्रतिनिधि हैं ।

(b) वकीलों को negotiators के रूप में प्रयोग न करें जब तक उनको औद्योगिक सम्बन्धों की गहन जानकारी न हो ।

(c) विवादास्पद विषयों पर यूनियन के साथ अनुबन्धों को सीमित न करें, लेकिन ऐसे मामलों पर विचार करें जो दोनों हित में हों ।

सामूहिक सौदेबाजी सामान्यत: एक ऐसे ठहराव में किया जाता है Union Contract या Labour Management Agreement के रूप में जाना जाता है । उन सेवा शर्तों का एक विवरण होता है जिसे दोनों पक्षकारों के बीच किया जाता है ।

एक सामूहिक ठहराव के लिए अमेरिकन शब्द Labour Contract है, जिसमें कार्य की शर्तें आदि प्रपत्र में संक्षिप्त विवरणों के साथ शामिल की जाती हैं । Collective Agreement अंग्रेजी मद है, जिसमें एक ऐसे लघु विवरण का बोध होता है, जो उस दर की स्थापना करता है, जिस पर एक श्रमिक को भुनाया जाना चाहिए ।

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निर्धारित मजदूरी, काम के घंटे, लिये जाने वाले apprentices की संख्या विवादों तथा/या शिकायतों के निपटान हेतु मशीनरों में परिवर्तन छुट्टियाँ आदि सहित; यह इसका भी संकेत दे सकता है, कि कैसे स्थानीय शिकायतों को तटस्थ समितियों में वर्कशॉप या शिपयार्ड विवेचनों के लिए व्यवस्था करके व्यापक एवं दूरगामी विवादों में विकसित होने से रोका जा सकता है ।

जिसके सदस्यों को राष्ट्रीय स्तर पर यूनियनों तथा कर्मचारियों के बीच सभाओं के बाद सम्बद्ध कारखानों तथा स्थानीय गोष्ठियों से लिया जाता है ।

तथाकथित Soviet Union Labour Code के Article 15 अनुसार, ”एक सामूहिक समझौता ऐसा समझौता है, जो एक ट्रेड यूनियन के बीच किया जाता है (within the measure of article 1.52 and 1.53 of the Code) मजदूरी कमाने वाले तथा वेतन भोगी कर्मचारियों एवं सेवायोजकों के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हुए ।”

(5) अनुशासन गतिविधि (Follow-Up Action):

ठहराव मुद्रित होना चाहिए तथा सभी कर्मचारियों में वितरित किया जाना चाहिए ताकि वे सही-सही जान सकें कि प्रबन्ध तथा उनके प्रतिनिधियों के बीच क्या-क्या सहमति हुई है । पर्यवेक्षकों की सभाएँ भी बुलाई जानी चाहिए ताकि उन्हें ठहराव की विषय-वस्तु से भली प्रकार अवगत कराया जा सके और उसे वे उसको प्रभावी तौर पर क्रियान्वित कर सकें ।

2. अनुबन्ध प्रशासन का चरण (The Stage of Contract Administration):

अनुबन्ध(Contract) सामूहिक सौदेबाजी की प्रक्रिया के इस चरण में सामूहिक अनुबन्ध को जन्म देती है । यह अनुबन्ध आने वाले वर्ष या वर्षों के लिए श्रम-प्रबन्ध सम्बन्धों की प्रकृति का औपचारिक बातों के रूप में निर्धारण करता है ।

सामान्यतया यह माना जाता है, कि ऐसे अनुबन्धों का औसत समय दो या तीन वर्ष होता है, विश्लेषण भी किया जाता है । यह अनुबन्ध बहुत ही विस्तृत तौर पर बनाये जाते हैं । इसमें संघ की सुरक्षा परिवेदना पद्धति, पदोन्नति, हस्तान्तरण, जबरी छुट्टी, मजदूरी दरें एवं श्रेणियाँ, कार्य के घण्टे, छुट्टियाँ, प्रेरणा पद्धति, सुरक्षा एवं स्वास्थ्य, प्रबन्धकीय दायित्व, आदि सम्मिलित किये जाते हैं ।

अनुबन्ध प्रवर्तन (Implementation of the Contract):

सामूहिक सौदेबाजी का अन्तिम चरण सम्बन्धित पक्षकारों के मध्य हुए अनुबन्धों का प्रवर्तन कराना है । इतिहास इस बात का साक्षी है, कि भारत में इन अनुबन्धों का प्रवर्तन करने के लिए इन प्रतिनिधियों ने समय-समय पर कई कदम उठाये हैं; जैसे -न्यायालय की शरण लेना; पुन: हड़तालें कराना, आदि । इस प्रकार यह सामूहिक सौदेबाजी का अन्तिम चरण है ।

Arnold Campo ने निम्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है, जो ट्रेड यूनियन तथा प्रबन्ध के बीच एक अनुबन्ध की शर्तों के प्रशासन के उत्तरदायित्व से निहित कर्मचारियों का मार्गदर्शन कर सकेंगे ।

यूनियन और प्रबन्ध के लिए (For Union and Management):

(a) दोनों को ही सामूहिक सौदेबाजी की मशीनरी को स्थापित करने तथा सशक्त बनाने के लिए ईमानदारी से प्रयास करने चाहिए तथा इसको प्रभावी तौर पर काम करने देना चाहिए । दूसरे शब्दों में, दोनों ही पक्षकारों को एक-दूसरे के प्रति सहनता का रुख अपनाना चाहिए । तथा उदारता तथा ख्याति की भावना दिखानी चाहिए । उनको एक-दूसरे से सहयोग का इच्छुक होना चाहिए ।

(b) शिकायतों के निदान हेतु एक उचित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए । यह उस तरीके को प्रत्येक को समझाने के लिए अच्छी प्रैक्टिस होती है, जिसमें शिकायत निदान प्रक्रिया को सम्भाला जाना चाहिए । कैसे शिकायतों से तत्परता से निपटा जाना चाहिए; कैसे शिकायतों को लिखित में लाया जाना चाहिए, कैसे वे घटक जिन पर दोनों पक्षकार सहमत हैं, उचित तौर पर स्पष्ट किया जाना चाहिए; कैसे Grievance Committee की सभाएँ समय के दौरान आयोजित की जानी चाहिए, कैसे सुनिश्चित करें कि सुपरवाइजर्स तथा फोरमैनों को शॉट सर्किटिड नहीं किया जाता ।

क्योंकि इससे मनोबल नष्ट हो जायेगा; तथा कि शिकायत प्रक्रिया को ऐसे मुद्दों के ईद-गिर्द नहीं होना चाहिए जो किसी भी दृष्टि से शिकायतें नहीं हैं ।

(c) जब एक शिकायत के निदान पर गोष्ठी किसी गतिरोध पर पहुँच जाती है, तो शिकायत को पंच निर्णय को सौंपा जाना चाहिए । जब ऐसा किया जाता है, तो पंच निर्णायकों को सावधानीपूर्वक चुना जाना चाहिए ।

(d) दोनों पक्षों को यह देखना चाहिए कि किसी भी पक्षकार द्वारा की गई वचनवद्धता का पूरी तरह पालन हो इस सम्बन्ध में यह अच्छा रहेगा यदि एक दृढ़ follow-up guarantee प्रयोग की जाती है ।

प्रबन्ध के लिए (For the Management):

(a) प्रबन्ध को श्रमिकों के प्रतिनिधियों के साथ गोष्ठियों के लिए उपलब्ध होना चाहिए ताकि इसको बदलते रुझानों तथा अपने कर्मचारियों की समस्याओं की तत्क्षण जानकारी मिल सके ।

(b) प्रबन्ध को यूनियन के प्रतिनिधियों को शॉर्ट सर्किट नहीं करना चाहिए । अथवा यूनियन की अधिसत्ता को नजरअन्दाज नहीं कर देना चाहिए । कोई भी प्रस्तावित नीति तथा/या कार्यक्रम पहले कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के साथ सोचा विचारा जाना चाहिए इससे पहले कि उनको उसको सौंपा जाये ।

(c) प्रबन्ध को सदैव ही उसके द्वारा प्राप्त किसी भी अच्छी बात के लिए ट्रेड यूनियन का अभारी होना चाहिए ।

(d) प्रबन्ध को पितृवाद का निराकरण करना चाहिए तथा ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों तथा अपने कर्मचारियों को समान मानकर व्यवहार करने के लिए तत्पर रहना चाहिए ।

(e) प्रबन्ध को यह भी देखना चाहिए कि फोरमैन तथा सुपरवाइजर्स ऐसे ठहराव की किसी भी शर्त से व्यापक तौर से परिचित हैं, जो कर्मचारियों या उनके प्रतिनिधियों के साथ की जा चुकी है, ताकि वे उसको क्रियान्वित कर सकें तथा यह देख सकें कि उनका उचित तौर पर क्रियान्वयन किया जाता है ।

(f) यदि प्रबन्ध अपने श्रमिकों को नियमित रोजगार देने के लिए वचनबद्ध हो । अनेक प्रतिबाधक व्यवहार, जो श्रमिकों की ओर से अनुचित माँगे जान पड़ती हैं, लुप्त हो जायेंगी ।

(g) प्रबन्ध को देखना चाहिए कि उससे उच्च अधिकारी तथा वे सभी जिनको उनके क्रियान्वयन के साथ कुछ भी लेनादेना है, ऐसे किसी भी ठहराव की शर्तों को समझते हैं, जो कर्मचारियों तथा उनके प्रतिनिधियों के साथ हो चुका होता है ।

ट्रेड यूनियन के लिए (For the Trade Union):

(a) ट्रेड यूनियन को यह देखना चाहिए कि उसके सदस्य उस ठहराव की शर्तों को समझते हैं, जो उसने प्रबन्ध के साथ किया है ।

(b) ट्रेड यूनियन का यह उत्तरदायित्व है, कि उसके सदस्य ईमानदारी के साथ ठहराव की शर्तो का पालन ।

(c) यूनियन के प्रतिनिधियों को एक गोष्ठी के लिए स्वयं को उपलब्ध रखना चाहिए जब भी उनको प्रबन्ध द्वारा ऐसा करने के लिए कहा जाये ।

लेकिन प्रबन्ध तथा यूनियन दोनों के द्वारा अपनाई गई रणनीतियों को देखते हुए यह स्पष्ट है, कि सामूहिक सौदेबाजी प्रक्रिया अविश्वास टकराव तथा पारस्परिक द्वेष के दूषित वातावरण से समाप्त हो जाती है, तथा एक पारस्परिक Give-and-Take की भावना में क्रियाशील नहीं हो पाती । अत: यह कोई आश्चर्य नहीं है, कि सामूहिक सौदेबाजी की प्रक्रिया विवाद की परिस्थितियों, तृतीय पक्षकार व्यवधान, कानूनी लड़ाइयों आदि द्वारा गड़बड़ा जाती है ।

निम्न घटक जो सामूहिक सौदेबाजी में प्रगति लाते हैं:

(i) आर्थिक घटक (Economic Factors),

(ii) मनोवैज्ञानिक घटक (Psychological Factors),

(iii) शक्ति संरचना को प्रभावित करने वाले घटक (Factors Influencing the Power Structure) ।

आर्थिक घटकों के अन्तर्गत उत्पाद तथा बाजार की प्रकृति पूँजी आवश्यकताएँ, लागत की परिस्थितियाँ, स्वामित्व तथा व्यावसायिक चक्रों को शामिल किया जाता है । एकाधिकारी परिस्थितियाँ तथा प्रबन्धकीय नियंत्रण का संकेन्द्रण ट्रेड यूनियन की सामूहिक सौदेबाजी की कमजोर स्थिति को स्पष्ट करता है ।

भारत में श्रम बाजार सेवायोजकों के लिए अनुकूल रहा है; श्रमिक सामान्यत: अशिक्षित तथा अनिपुण होते हैं, तथा उनकी सौदेबाजी शक्ति कमजोर रही है । सेवायोजक बहुधा सशक्त हैं तथा अपने श्रमिकों के प्रति संरक्षणकारी रूख अपनाते हैं ।

दूसरी ओर ट्रेड यूनियनों को प्रतिद्वन्द्वियों द्वारा कमजोर किया जाता है, और इसीलिए उनको उतनी मजबूत सौदेबाजी शक्ति नहीं बन पाती । मनोवैज्ञानिक घटक बहुधा अपने अधिकार, विशेषाधिकारों तथा उत्तरदायित्वों एवं उनके पारस्परिक दायित्वों के प्रति प्रबन्ध तथा ट्रेड यूनियनों की गतिविधियों द्वारा निर्धारित होते हैं ।

एक ट्रेड यूनियन जो ऐसे नेताओं द्वारा प्रबन्धित होती हैं । जो insiders तथा outsiders दोनों ही होते हैं, इस प्रकार सामूहिक सौदेबाजी को उनके रुझानों नजरियों अभिप्रेरणा मनोद्वेगों आदि द्वारा विचारणीय तौर पर प्रभावित किया जाता है ।

शक्ति संरचना घटकों के अन्तर्गत सम्बद्ध पक्षकारों की लड़ने की ताकतों को शामिल किया जाता है । यह लड़ने की ताकत मुख्यत: किसी पक्षकार की सामूहिक सौदेबाजी में एक ‘काम रोको’ (श्रमिकों द्वारा हड़ताल या प्रबन्ध द्वारा तालेबन्दी के रूप में) के लिए विवश कर देने की क्षमता का संदर्भ लेती हैं, तथा इसे अपेक्षित अवधि तक चालू रखने की ताकत रखती है, जब तक अन्य पक्षकार पसीज नहीं जाते ।

प्रबन्ध की लड़ने की ताकत work-stoppage की लागत पर तथा वित्तीय परिस्थितियों तथा संगठन की अपेक्षाओं पर निर्भर करती है । यदि ‘कार्य रोको’ लम्बा चलता है, तो प्रबन्ध की जुझारू शक्ति कमजोर हो जायेगी । दूसरी ओर यूनियन की जुझारू ताकत हड़ताल कोष के आकार पर अर्थात् उसकी वित्तीय स्थिति पर निर्भर करती है ।

यदि ये प्रतिकूल होती है, तो निश्चय ही जुझारू शक्ति कमजोर हो जायेगी तथा उस दशा में उसको प्रतिकूल शर्तों के होने पर भी अपनी माँगों को नीचे लाना पड़ेगा या स्वीकृति देनी होगी ।

निम्न घटक या गतिविधियाँ प्रभावी सामूहिक सौदेबाजी के प्रति अवरोधकों के रूप में काम करते हैं:

(1) कुछ सेवायोजकों की ट्रेड यूनियनों को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का एक स्थायी लक्षण स्वीकार करने की असफलता ।

(2) ड्राफ्ट ट्रेड यूनियनों की विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ ।

(3) सामूहिक सौदेबाजी के लिए तैयारियाँ करने के लिए पर्याप्त समय तथा शक्ति लगाने की दोनों पक्षकारों की असफलता ।

(4) तथ्यगत सूचनाओं की अनुपलब्धता ।

(5) अनुचित व्यवहार ।

(6) किसी भी पक्षकार की ओर से ऐसे दायित्वों को वहन करने के प्रति स्वेच्छा का अभाव जो सामूहिक सौदेबाजी प्रक्रिया में अन्तर्निहित होते हैं, तथा

(7) पक्षकारों की असमान शक्ति दोनों पक्षकारों को इतना दृढ़ होना चाहिए कि एक-दूसरे से हिल जायें या दमन में आ जायें या अतिरंजित हो जायें ।